किस्सा बस ये, रह गया ज़माने में,

वो गिर गया, उसे गिराने में।

वो दोनों ही, रोयेंगे देखना,

फिर किसी शाम, किसी मयखाने में।


मुझको तो, कोई अंतर नहीं दिखता,

किसी बस्ती में या वीराने में।


दिल में रहोगे, तो रह लेना,

जगह कम ही है, मेरे आशियाने में।


रिश्ते जो पल भर में, पनप जाते हैं,

सदियां लगती हैं, उन्हें भुलाने में।


जख्मों को खुला ही रहने दो,

दर्द होगा, इन्हें दबाने में।


कोई किसी के लिए, खास है कितना,

उम्र गुज़र जाती है, ये बताने में।


रेत सा वक्त, निकल जायेगा हथेली से,

कभी सुनने में, कभी सुनाने में।।


~ नितिन कुमार हरित