मरुभूमि नहीं,
हृदय में मिट्टी चाहिए मुलायम,
ताकि बोयें जा सकें,
कल्पनाओं के बीज !
और फिर, सींचना पड़ेगा उन्हें..
निरन्तर भावनाओं के पानी से,
तब फिर कहीं जाकर,
लगते हैं शब्दों के फल।
कुछ खट्टे, कुछ मीठे..
और हां, कुछ कड़वे भी..
शबरी की तरह चख चख कर चुनना पड़ता है..
एक एक शब्द,
तब कहीं जाकर कविताएं बनती है !
किसने कहा? मैं अनायास ही लिख देता हूं !
- नितिन कुमार 'हरित'

