मेरे अंतर से उठती है, मेरे होठों से गाती है,
मैं रोता हूँ तो रोती है, हँसूँ तो मुस्कुराती है।
मैं हिंदी, सच कहूं तो यार, मेरी माँ के जैसी है,
तड़पता देख के मुझको, गले से आ लगाती है।

– नितिन कुमार हरित