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दीवारें


कल,बड़ी देर तक देखता रहा मैं..सामने की दीवार।पपड़ियां सी उखड़ आयीं हैं,कमज़ोर हो रही है दिन ब दिन,और शायद अगली बरसात में गिर ही जायेगी।काश...ऐसे ही बदलते वक़्त में, कमज़ोर हो जातीं,ये दीवारें, दिलों की भी !!

— नितिन कुमार हरित
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