क्या तेरा, क्या मेरा जग में, चिड़िया रैन बसेरा हो,

जीना हो तो कुछ ऐसे जी, छूटे जग का फेरा हो।


मैं मैं करता कौन थका है, सुध बुध सब बिसराई रे,

धर्म कर्म सब रुपया पैसा, दौलत खूब कमाई रे,

मौत खड़ी थी जब द्वारे पर, दौलत काम ना आई रे,

करनी का फल मिला जगत में, देता फिरे दुहाई रे,

कितना सच है, कितनी उलझन, कैसा भ्रम का डेरा हो !

क्या तेरा, क्या मेरा जग में, चिड़िया रैन बसेरा हो ।।


माया की माया तो देखो, जो जीवन तू पाले रे,

वो ही जलाए, वो ही फूंके, वो ही मिट्टी डाले रे,

जो डूबे उसे कौन बचाए, गिरता कौन संभाले रे?

दीपक के जलने से होते, भीतर कौन उजाले रे?

मन के भीतर ज्योत जगा ले, कर ले दूर अंधेरा हो।

क्या तेरा क्या मेरा जग में, चिड़िया रैन बसेरा हो।।


~ नितिन कुमार हरित