आग जलाता हूँ मैं !


कभी कभी, हालात से दो हाथ, जब कर नहीं पाता हूँ मैं,

अनजान रस्तों पे, चल चल कर, सच ! जब थक जाता हूं मैं,

आग जलाता हूँ मैं !!


अपने अस्तित्व पर, बादल सा, जब खुद ही मंडराता हूँ मैं,

लाख कोशिशें, मगर, साहस को जुटा नहीं पाता हूं मैं,

आग जलाता हूँ मैं !!


हां वो आग, जिसका ईंधन मैं खुद ही होता हूँ।


~ नितिन कुमार हरित