बचपन का वो दिन मुझे आज भी याद है। उस रोज़, दोपहर का खाना खाया और सो गया। शाम हो आयी पर आँख ही नहीं खुली। घर के दरवाज़े पर पूरी मित्र मंडली जमा हो गयी थी। हमारा नियम जो था, जो टाइम पर नहीं आयेगा, उसे बुलाने उसके घर, सारे के सारे जायेंगे, मिल के। 

अचानक आँख खुली, सीधा मुँह धोया और बस निकल पड़े... आज आइस पाइस का प्लान था। सारे के सारे एकदम तरोताज़ा। जैसे शाम नहीं, हमारी सुबह ही हुई हो।

सच, याद आती हैं वो बचपन की शामें, जब शामें, शामें नहीं सुबह ही हुआ करती थीं। 

जबसे बड़े हुए हैं, सुबह भी सुबह नहीं होती। हर पल बस छाया रहता है धुँधला धुँधला कुहासा...!

- नितिन कुमार हरित #nitinkrharit