ख़्वाब भी परेशान है इन आँखों में आकर,

कहता है कि मुझे वहाँ मुंतखिल करो,

जहाँ कमसेकम मेरे मुकम्मल होने की गुंजाइश तो हो,

क्यूँ बियाबान से जज़ीरों पे क़ैद कर रखा है,

मुझे उस पार ले चलो जहाँ मेरी हस्ती की नुमाइश तो हो,

क्यूँ रात के आफ़ताब का आईना दिखाते रहते हो,

कभी उस सुबह का भी दीदार करवाओ, 

जहाँ सूरज की रौशनी की इनायत तो हो,

कभी उस किताब का पन्ना ही पढ़वाओ,

जिसमें तुम्हारी ख्वाहिशें हासिल करने की हिदायत तो हो,

हर रोज़ तुम्हारे दर पे दस्तक देता हूँ मगर फिर भी बेवफ़ा कहलाता हूँ,

मुझे उस मकान में ले चलो जहाँ मेरी वफ़ा की इबादत तो हो,

इन आँखों की पुतलियों पर हर वक़्त सुस्ताता रहता हूँ,

मुझे उस खुले आसमान में ले चलो,

जहाँ अपने पँख फ़ैलाने की रियायत तो हो...

हाँ, मुझे उस जहान में ले चलो,

जहाँ मुझे आज़ाद परिंदे सी उड़ने की इजाज़त तो हो..