बह जाने दो मुझे उस दरिया सा,
जो परबतों की कैंद से निकलकर,
समंदर से मिलती है आज़ाद होकर...
बरसने दो मुझे उस बारिश सा,
जो बादलों को चीरकर,
जलती सी ज़मी को ठंडा कर जाती है...
चलने दो मुझे उस हवा सा,
जो तपती सी गर्मी में नर्मी सा सुकून दे जाती है...
उड़ने दो मुझे उस परिंदे सा जो अपने छोटे से पंखो से,
आसमान में लम्बी उड़ान लगाता हैं...
अब बहुत हुआ कैंद में जीना मुझे आज़ाद रहने दो तुम,
उस बेबाक दरिया सा, उस नाचती बारिश सा,
उस चंचल हवा सा, उस बेपरवाह परिंदे सा..
बस बह जाने दो मुझे तुम...