जाने क्यूँ खामोश हूँ मैं? कुछ गवां दिया मैंने या कुछ खोने का डर है जीतने पे तो जुबां रूकती नहीं शायद हारने का असर है खत्म हो गयी बातें सारी या किसी कश्मकश ने मुझको घेरा है खुशियों पे तो जश्न हुए हैं शायद गम का घना अंधेरा है बस शौक में खुद को बदला है या कोई मजबूर वक्त आ ठहरा है महज ठोकरों पे तो लब थमे नहीं शायद जख्म बड़ा ही गहरा है।।