सवेरा's image
Share0 Bookmarks 17566 Reads1 Likes
ठोकरें जो खा रहा हूँ,
पत्थरों सा हो चला हूँ,
वक़्त की कारीगरी को,
बस समेटे जा रहा हूँ।

डर है तो अब एक ऐसा,
कहीं हो न जाउँ उस पाषाण सा,
जिसके दर पर झुकते सर हैं,
पर वो नहीं सुनता किसी का।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts