ये महफिलें हैं रेेशम से लदे मख़सूस लोगों की ,
हम फटे कुर्ते में ही खुद को समेटने का हुनर जानते हैं।
वो दूर जाके बैठते हैं जैसे पहचानते ही नहीं ,
मै खुदा को भी झुठला देता हूँ उनको कभी नहीं।
वक्त का तजुर्बा भी कुछ हो चला है निशांत,
तुम्हे ही लगता था कुछ लोग बदलते कभी नहीं ।
यें दौलतें, शोहरतें, उल्फतें,कब्र तक जाता कुछ नहीं,
एक मुश्त खाक हैं हम उससे जियादा कुछ नहीं ।

