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मैं शहर हूँ...

मुस्कानों का बोझा ढोए,

धुन में अपनी खोए-खोए

ढूँढता कुछ पहर हूँ।

मैं शहर हूँ।


बेमुरव्वत भीड़ में,

परछाइयों की निगहबानी,

भागता-सा हाँफता-सा

शाम कब हूँ, कब सहर हूँ,

मैं शहर हूँ।


सपनों के बाजारों में क्या,

खूब सजीं कृत्रिम मुस्कानें,

आँखों में आँखें, बात

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