जब भी थकता था,आके बैठता था तू छांव में मेरी

आज केसे हुआ इतना मजबूर कि काट दिया मुझे जरूरतों ने तेरी, ना देख इधर उधर में वृक्ष हूँ सुन मेरी आवाज़ तू,

दिये थे मेने निस्वार्थ फल फूल तुझे जेसे ममता कि छांव,

अपनी जरूरतों ने बना दिया इतना स्वार्थी तुझे जड़ से उखाड़ दिया मेरी ही जगह से तूने मुझे..........

Siya raghuwanshi