जिस आँगन मैं, मैं खेलीं वो आँगन पराया है, ना जाने किसने ये रिवाज बनाया है ,जो ना आने देता था मुझपर धूप का साया, आज उस पिता ने ही कर दिया मुझे पराया
आज छूट गयी मेरी वो सखियाँ, जिनके संग बिता था बचपन मेरा, वो झूले वो आम के वागान अब देख कर याद करेंगे मुझे वो लोग सारे...................
Siya raghuwanshi


