किसी ने क्या खूब कहा है ,
गुजर रही हैं जिंदगी ऐसे मुकाम से, अपने भी दूर है जरा से ज़ुकाम से, तमाम कायनात में "एक क़ातिल बीमारी "की हवा हो गयी है, वक्त ने ऐसे सितम ढाया है कि दूरियाँ ही दबा हो गयीं,
लौट आएगी खुशियां, अभी कुछ ग़मों का शोर है
ज़रा संबल कर रहो अजीजो ,अब फिर से इम्तिहान का दौर है, खैरियत से हूँ में अपने शहर में, तुम अपने शहर में अपनी हिफ़ाज़त रखना, किसी का हाथ छुना नहीं, किसी का साथ छोड़ना भी नहीं
Siya raghuwanshi


