तिनक समान विजन बचा है,
तुषार भी बरबस पिघल रहा है,
घटा के दर्शन मात्र को भी,
भू का आनन मचल रहा है,
भुवन का स्वरूप मानो कोई,
अंगीठी में बदल रहा है,
इस गुबार का साया हमपर,
वर्षों से अविरल रहा है,
उच्छ्वास में व्यर्थ न कर,
वक़्त हाथ से फिसल रहा है,
कुदरत का बस एक तकाजा,
जाते जाते एक दरख़्त लगाजा,
अवनी की छाती को खोल ज़रा,
उसमे थोड़े बीज दबा जा,
इस दरख़्त के नीचे होंगे मुसाफिरों के बसेरे,
बच्चे भी टायर के बनायेंगे हिंडोले,
प्रकृति पर आन पड़ी विपत्ति,
बैठी है इन्सान के सहारे,
बस सूख न जाए सरिता का पानी,
कहीं एक न हो जाए दो ‘किनारे’ |