प्यार

इश्क

मोहब्बत

चाहत

और 

फ़िर

वो …!!!

न जाने कितनों से सुना , कितनों को पढ़ा।

सब ने अपनी अनोखी मोहब्बत 

बे - हिसाब ख्वाबों और रंगीन स्याही से सजाई है।

बहुत उम्दा , बे - हद खूबसूरत और अविश्वनीय विश्वास के साथ कई चाहतों से रूबरू हुई मैं।


और फ़िर वो।

एक साधारण सा लड़का

सांवला रंग

बड़े - घने बाल ( की हाथ ही फेर लूं)

मचलती आंखें

होटों को चीरती दांतो की कतार।

और एक मुलाक़ात।

नहीं उसने कुछ कहा नहीं , कुछ जताया नहीं

बस यूंही समझ गई मैं।

कि प्यार जो बताया जाता वो नहीं,

बल्कि उन पंक्तियों के दरमियां हर लम्हा प्यार है 

जो उनसे कई ज्यादा मायने रखता है।


जाना मैने,

कि साथ में चाय पीना

कभी बिना लड़े , उससे सुन लेना

रात को उसके साथ जागना 

उसकी मां को 'मां '  कहना 

जब वो परेशान हो तो पास में बैठ जाना

कभी कभी उसके डिब्बे में पसंद का स्वाद भरना 

प्यार है।


यक़ीन हुआ,

जिस्म की नुमाइश से परे 

रूहानियत है,

तो प्यार है।


हंसना - रोना , आंखों  से जब बात हो ,

तो प्यार है।

चुप है वो  

उस चुप्पी का  भी तुम्हे इंतज़ार है

तो प्यार है।


और 

फ़िर

" वो….."

प्यार है…..!!!!


कहूं तो, हमारी हर एहतियात पर 

वो सोच समझ कर की गई भूल ,

प्यार है।




Niriksha kansara