।। कुछ तो था हम दोनों के दरमियां ।।
कुछ बातें थी , कुछ किस्से थे
अल्फ़ाज़ गिने चुने थे , पर लम्हें कई बुने थे ।
कुछ...था
कुछ , तो था...।।
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हजारों के बीच कुछ बात थी , जो हमने ही समझी थी।
कुछ हरकतें थी , कुछ नादानियां ।
एक इत्र था जो मेरी रूह को महका रहा था,
एक नाम था , जो मुझे बहका रहा था।
कुछ बेचैन रातें थी
कुछ सुकून से भरे दीदार थे ।
कभी उसका होना आफ़त था, तो कई बार राहत ।
बिजली की नंगी तार - सा
पर रोशन सवेरे - सा
कुछ , तो था ।।
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एक मौसम नया - सा , एक किरदार नया था
दिल को भाने लगा था , ऐसा कुछ किस्सा होने लगा था ।
रातों को जागना,
चारोपहर उसे सोचना,
खुद से लड़ना - खुद को भूलना,
अब अच्छा लगने लगा था।
कुछ , हुआ था,
कुछ … ।।
तेरी मिठास थी जो मुझमें घुल रही थी
मेरी प्यास थी जो तुझसे मिट रही थी।
न काग़ज़ था न कलम
पर अपनी अखों से , मैं तुम्हे दिल में उतार रही थी।
कुछ...था..।।
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प्यार मुझे तुझसे ही नहीं , तेरे होने से भी था ।
इस बात से भी था कि तू यहां होता तो ,
ये करता - वाहं को जाता….।
तेरे बोल, तेरा हंसना,
तेरा साथ ;
जो मेरी हयात को वजूद दे।
" प्यार था मुझे "
था…..
कुछ , तो ज़रूर रहा..।।
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जैसे ;
कृष्ण को बांसुरी,
कदमों को ज़मीं,
खाने को ज़ायका,
निगाहों को नज़रिया,
और
राहों को रही,
वैसे……,
" मेरे लिए …...तू "
।।...था….कुछ तो था ,
हम दोनों के दर्मियां ।।
NIRIKSHA KANSARA


