कभी जागो आधी - सी उस रात में

तो  पूछना उसे

कि कितने रंगों से सजाया है मैंने तुम्हें

उस काली अंधेरी रात में।


पूरी रात निकल जाती है खुद को तुम्हारी बातें बतलाते।


हो सके तो कभी महसूस करना 

उन हवाओं को जो मेरे घर से होकर आती हो,

तेरे दिए उन सूखे गुलाबो की खुशबू 

किताबों से निकलकर  आज भी महकती है।


पता है, रात भी रात से जलने लगती है,

जब सुनाता हूं उसे हमारी ' रातें ' 


ज्यादा तो कुछ नहीं पर कोशिश करता हूं 

की रात में चमकते हर सितारे का नूर और उस रात में चांद का वो अस्तित्व तेरे नाम कर दूं।


कभी जागो आधी सी उस रात में

तो पूछना उसे……………


शायद फिर कहीं

तुम आधी उस रात में

खुद को पूरे से कुछ ज्यादा महसूस कर पाओगी।



उस दिन के बाद हर रात तुम्हे खुद में महफूज़ रखा है मैने।





Niriksha kansara