एक छात्र का सपना ...
जब झांसी की रानी आई
स्वप्न अल्प आभा में,
उस लघु वार्ता का वर्णन
करता हूं इस कल्प सभा में,
वो कहती कि हे युवा तुम्हें मां भारती ने पुकारा है,
इसकी सेवा करने का ही कर्तव्य सदा तुम्हारा है,
देखो जैसे मैंने इसकी रक्षा की है प्राण देकर,
तुम्हें भी नाम ऊंचा रखना है भारत मां को सम्मान देकर,
मैंने पूछा अब देशभक्त कहां है आप जैसे
सब स्वार्थ में लिप्त यहां हैं कलयुगी सांप जैसे
जिह्वा पर भारत भारत रखते हैं हृदय में इनके द्रोह भरा है,
राजनीति के पक्के खिलाड़ी धन वैभव का मोह भरा है,
रानी झांसी मुझसे बोली यही विडंबना देश की,
तुम बदलो जग बदलेगा क्यों सोचते शेष की,
उठो जागो अपने कर्तव्य पथ पर निकलो,
देश का मान बढ़ाना है,
हर कर्म में, हर अक्षर में, हर कण में, हर क्षण में,
समर्पण का भाव जगाना है।।
निद्रा टूटी जब मेरी दर्पण में मैंने देखा
आलस्य का चोला उतार कर दूर मैंने फेंका,
नमन किया सब स्वातंत्र्य वीरों को, मन में मैंने ठाना,
आज अभी से मातृभूमि को ही सर्वस्व माना।
