खड्ग जो मेरी लाल हो, ना किसी की अब मजाल हो,

क्रांति हो तो ऐसी हो, उदाहरण सहस्रों साल हो,

रक्त में उबाल हो, धधकती... क्रोध की मशाल हो,

धड़कनें भडक रही मानो कि भूचाल हो!!


मां "भारती" पुकारती, कहां पर मेरे लाल हो?

यदि! तनिक मेरा ख्याल हो, ना द्वंद्व ना सवाल हो||

लहू से यूं तू कर श्रृंगार, आंचल ये मेरा लाल हो,

विजयी तुम्हारा भाल हो,

धरा पर शत्रु का कपाल हो||

खड्ग जो मेरी लाल हो, ना किसी की अब मजाल हो||


राक्षसों का अंत हो, हो तो मात्र संत हों,

धर्म हो सुपंथ हो, निर्माण हो ना कि विध्वंस हो,


उठो उठो बढ़ो बढो, बढो बढो बढे चलो,

लगा कर मृत्यु कंठ से, तुम लौह में ढले चलो!


विजय की भोर हो सदा, ना हार की निशीथ हो,

हृदय में एक ही भाव हो, कि सदा धर्म की ही जीत हो,


सिंह सी दहाड हो, चाहे समक्ष कोई पहाड हो,

स्वार्थ की कपट की आज देदो तुम आहुति, स्वाह करके भय को आज शत्रु को, तुम जमीं में गाड दो||


स्वयं की पहचान रख मां "भारती" का मान रख

महादेव का वरदान ले जाजा जीत का स्वाद चख..||