उम्मीद
तुमने जो
हाथ झटका
दिल में खटका
मन भी अटका
मौसम की फटक
दिल की चटक
मन ना मने
सुभह है सांवली सलोनी
अब ना खुशगवार है
शामे ठिकाने थे मधुशाला में
अब चिराग गुल है मयखाने में
छलके ना जामे नशा
अब आँखों से
विरह की बुँदे
दे दस्तक आँखों में
आरजू तेरी दफ़न
अब क्या करे मयखाने में
मिन्नतें मेरी ना अभी खत्म
आस हुश्ने दीदार को
सच है मानो या मानो
उम्मीदी है दुनिया दत्त
छिपकर बार बार
सूरज चाँद
उगते है आसमां में
कवि फोरम
रचना
निरंजन गौतम दत्त
