मैं केवल आँगन की तुलसी नहीं,
मैं उस तुलसी की महक अपार हूँ।

हाँ, मैं कोमल हूँ, कमज़ोर नहीं,
भूल मत जाना मैं ही तो इस सृष्टि का आधार हूँ।

बाँध न पाओगे मुझे बंदिशों की बेड़ियों में,
अब मैंने ख़्वाबों को सच करना सीख लिया है।

घर को जो सँभाले, वो ममता की मूरत हूँ,
दफ़्तर को जो चलाए, वो नया विश्वास हूँ मैं।

कठिन राहों पर जो कभी थमे नहीं,
प्रगति के पथ पर बढ़ता इतिहास हूँ मैं।

ज़माना साथ दे न दे, कोई परवाह नहीं मुझे,
सपनो की इस सतरंगी दुनिया में देखो,
खुद के पैरों पर आज मेरा आत्म-विश्वास खड़ा है।