पहली बार कोई मुझसा मिला है
चल रहा एक नया सिलसिला है

बादल जो बिन बारिश बरसें हैं
मोहब्बत का ये ख़ूबसूरत सिला है

बंद खिड़की को खोला जब मैंने
बाग़ में वफ़ा का फ़ूल खिला है

मर्ज़-ए-इश्क़ की दवा हैं वो
बेवजह भला क्यों फ़ासला है

राह-ए-उल्फ़त में परेशान है दिल
ज़िंदगी से बस इतना सा गिला है.!