नब्बे का दशक था
जब प्रेम किसी एक का नहीं,
पूरे समय का हुआ करता था।
ना जल्दी थी, ना विकल्प,
बस एक भाव था
जो धीरे-धीरे
हर दिल में उतरता था।
वो प्रेम
अचानक नहीं होता था,
पहले पहचान बनता था,
फिर भरोसा,
फिर एक चुप-सी उम्मीद
जो बिना बोले
भविष्य रचती थी।
स्कूल, कॉलेज,
गलियों के मोड़,
बस स्टॉप पर ठहरती निगाहें
कहीं भी जन्म ले लेता था प्रेम,
और हर बार
इंसान से शुरू होता था,
पहचान से नहीं।
नामों से पहले
आँखें पढ़ी जाती थीं,
हँसी से पहले
ख़ामोशी समझी जाती थी।
