ना जाने कौन मेरे मन को
मौन कर गया,
जो बातें कभी आँखों से भी
बयाँ हो जाती थीं,
वही आज लफ़्ज़ों से भी
कहना मुश्किल कर गया।

ना जाने कौन था वो,
जो मेरे भीतर तक उतर गया,
हँसते हुए चेहरे के पीछे
एक ख़ामोश दर्द भर गया।

अब न शिकायत है,
न किसी से कोई सवाल…
बस एक अजीब-सी ख़ामोशी है,
जो हर पल कहती है—
कोई था… जो मुझे मुझसे ही
दूर कर गया।


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