सड़क की सोंधी खुशबु में,
वो मेरा दिल महकता है,
बारिश की टप टप बूंदों से,
तेरा आँचल फिसलता है,
मैं कह कर भी न कह सकता
तुझे कितना मैं चाहता हूँ
भरे भौरों के उपवन में,
तेरी आवाज पाता हूँ।।
तूफानों से बिछड़कर भी,
ज़मी पर ढूंढ़ लाऊँगा।
सितारों के जहां में भी,
तेरी उम्मीद पाउँगा।
मेरी धरती को रोशन कर,
मेरे गीतों की धुन बन जा,
कड़े मौसम में- बूंदों में,
मेरी उजली किरण बन जा।।
हाँ नोसिखिया हूँ पागल मैं,
तेरी उम्मीद करता हूँ,
जतन ऐ लाख कर लूं पर,
मैं पानी सा फिसलता हूँ।
तेरे रंगों की दुनिया से,
नावाकिफ मैं पतंगा हूँ।
भले ऐ लाख जन्नत हों,
मैं तेरी लौ को चाहता हूँ।।
तू कहने को ही हाँ कर दे,
मेरे गीतों को- सपनों को,
मेरी आँखे तरसती हैं,
तेरी आँखों की साकी को,
दो रेशम के वो धागे दो,
उड़े जो तेरे क़दमों से,
मैं उन धागों को लेकर ही,
मेरा रुमाल पाउँगा।।
तेरी सांसों की खुशबु से,
मेरी ये रूह महकती है,
तेरी ज़ुल्फो की रौनक से,
मेरी शामें ठुमकती हैं,
वो सोने सा तेरा मुखड़ा,
मेरे क़तरे में जिंदा है,
वो सोने पर मेरा सोना,
सितारों सा चमकता है।।
तेरी मुस्कान की महफ़िल,
मेरी धड़कन पे सजती है,
तेरे होंठों की लाली तो,
गुलाबों सी चमकती है,
मैं उन कलियों की लाली को,
अगर जो छू भी पाऊंगा,
ज़माने की तरन्नुम को,
मैं कागज सा उड़ा दूंगा।।
ये बोल ही नही केवल,
मेरे दिल की जुबानी हैं,
धरोहर की तरह रखो,
ये आँखों का ही पानी है,
तेरी पलकों की वो मोहलत,
मेरी धड़कन समझती है,
वो मोहलत ही हाँ काफी है,
मेरी सांसे चलाने को।।
ना मेरी है वो हिम्मत जो,
तेरी राहों को मैं रोकूँ,
ना मुझमें है वो साहस जो,
तेरी महफ़िल को मैं टोकूँ।
परिंदा हूँ मैं कागज का,
वसूलों से मैं डरता हूँ,
तेरी ज्वाला बिछुड़ने पर,
मैं मोम- सा पिघलता हूँ।।
मैं लिखकर छोड़ जाता हूँ,
मेरी आँखों के पानी को,
मैं किस्सा छोड़ जाता हूँ,
मेरी दुनिया-जवानी का,
तू इस किस्से को पढ़कर ही,
क्षणिक उम्मीद कर लेना,
मैं वो उम्मीद पाकर ही,
मेरा जीवन भुला दूंगा......... -निपुण वशिष्ठ 'तन्मय'