तिरे पास है रास्ता तिश्नगी का
तुझे वास्ता हैं मिरी जिंदगी का।
वो क्यूँ इल्तिज़ा दूरियों की करें जब
उसे भी नशा हो मिरी दिल-लगी का।
कहीं ढूंढते भी रहो हुस्न के दर
अभी तो मजा लो इसी सादगी का।
सभी राज - दाँ हो गए मेरे गम के
ढको अब ये पर्दा रह- ए- दोस्ती का।
तड़पता रहा क़ुर्बतों के लिए मैं
ख़ुदा तू पता दे किसी अजनबी का।
© निलेश बरई
