122-122-122-122       

तिरे  पास  है  रास्ता   तिश्नगी  का

तुझे   वास्ता   हैं   मिरी  जिंदगी का।


वो क्यूँ इल्तिज़ा दूरियों की करें जब

उसे भी नशा हो मिरी दिल-लगी का।


कहीं  ढूंढते  भी  रहो  हुस्न  के दर

अभी तो मजा लो इसी सादगी का।


सभी राज - दाँ  हो गए मेरे गम के

ढको अब ये पर्दा रह- ए- दोस्ती का।


तड़पता  रहा  क़ुर्बतों  के  लिए  मैं

ख़ुदा तू पता दे किसी अजनबी का।


© निलेश बरई