ये  न  समझो  बहुत  मगरूर हूँ मैं ज़रा  सा  खुद  का  ही गुरूर हूँ मैं।   बहुत  ही  जियादा जुदा हूँ मैं क्या क्यूँ  भला  सबका यहाँ हुज़ूर हूँ मैं।   मेरे  दामन में दाग ढूँढता हर कोई यहाँ  इस  कदर  क्या मशहूर हूँ मैं।   कागज़ की जमीं,कलम की कुदाल इक  खुशनसीब  सा  मज़दूर  हूँ मैं।   न रहीम की नीयत,न सूरत राम सी लेकिन  इक  इंसान तो ज़ुरूर हूँ मैं।