ये बिल्कुल न मानें मजहब की लकीर
प्यासा एक फकीर है,भूखा है कबीर।
एक गर्भ से आये हैं,दूजे में ही जाना है
रूह तो अपना सोना है,माटी है शरीर।
कोठी,गाड़ी,जेवर और करोड़ों लॉकर में
बिक गयी है गैरत , गिरवी हुई जमीर।
उसका हँसना हँसना ,उसका रोना रोना
वो है इस शहर का सबसे बड़ा अमीर।