वो लफ्ज़ों को यूँ उतार देता है
बेजान कागज़ों को बुखार देता है।
मिट्टी को उसकी सही इज़्ज़त तो
बस चाक पे कुम्हार देता है।
ख़्वाब ठगने जो आते हैं फ़िर
अपनी पलकों से बुहार देता है।
मालूम न था इतना तिजारती है
इक लम्हा भी वो उधार देता है।
है रोग अना का तो इश्क करो
अच्छे अच्छों को सुधार देता है।
तूफां, बाढ़, ज़लज़लों के बहाने
हमें खुदा इक पुकार देता है।