वो कहाँ महज़ अखबार बेचते हैं कभी खबर कभी अंगार बेचते हैं। यूँ ही नहीं लाचार दिखते हैं हम खुद को हम बार बार बेचते हैं। ख्वाहिशों की गुलामी अब है ऐसी कभी गैरत कभी दस्तार बेचते हैं। पता है मुझे खून मेरा ही बहायेगी पेट की खातिर तलवार बेचते हैं। ये जुरूरत भी भला कैसी बला है पूरी करने को घर बार बेचते हैं।