वो अंजाम कितना सुहाना था मुझे हारना ,तुम्हें हराना था। दर्द वो था जैसे कोई कीचड़ जो कमल सा इक फसाना था। सुन क्यूँ गए तुम आँखों से ही मुझे जो लफ्जों से बताना था। नशा जिंदगी का उतरा वहाँ वहाँ पे ही इक मयखाना था। प्यासों की उस बस्ती में तो बड़ा ही बोझिल सा नहाना था। वो गीत तुम सुन बैठे क्यूँ जो देख तुम्हें मुझे गाना था। जिसे कचरे में था डाल दिया कुछ भूखे लोगों का खाना था। न उसको कोई भी घर बोले जहाँ महज़ जाना आना था। चोरों की ही तो बस्ती निकली जहाँ हमने सोचा कि थाना था। मुकाम तुमने जिसको समझा तुम्हें खींच वहीं से लाना था।