उजाला यहाँ कम बिकता है अँधेरे का यहाँ डर बिकता है। मकानों की अब जुस्तजू ऐसी बसा बसाया घर बिकता है। उजड़ जाते हैं घोंसले उनके फिर उनका ही पर बिकता है। हर शय की कीमत अब है हर मादा हर नर बिकता है। ये शहर जुरुरत के मारों का है झुका हुआ हर सर बिकता है।