थोड़ा जो सुलझना है खुद से ही उलझना है। सीधा तो भटक लिए मुड़ के अब चलना है। बाहर से ही दिखते हैं अंदर अंदर खुलना है। हँस हँस के रो लिए रो रो के ही हँसना है। तुम कहते जिसे अना ज़मीर का वो गहना है। इक रिश्ता हुआ पहाड़ झूटा मूटा ही चढ़ना है। टुकड़ों में बहुत हुआ अब पूरा ही मरना है।