सफ़र में ठिकानों पर ठहरना भी जुरुरी है
शाम होते सूरज का ढलना भी जुरुरी है।
जुबाँ और कान को भी तो इतवार चाहिए
कभी कभी आँखों से ही कहना भी जुरुरी है।
बादलों का ये महाकुम्भ बहुत हसीं है मगर
इक कोने से सूरज का निकलना भी जुरुरी है।
रात को मीठा तो सुबह नीम का दातुन हो
बच्चों का माँ बाप से डरना भी जुरुरी है।
डालियों से सूखे पत्ते रक्स कर गिरते हैं
हँसते हुए जीना क्या मरना भी जुरुरी है।
खुदा होने का भरम हमें कहीं न हो जाए
कभी कभी ठोकरों पे गिरना भी जुरुरी है।