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सफ़र में मुकाम का बोझ क्यूँ हो

सफ़र में मुकाम का बोझ क्यूँ हो यूँ घर पे दुकान का बोझ क्यूँ हो। बेफिक्र होकर लिखें दिल की बातें ये ग़ज़ल है ,काम का बोझ क्यूँ हो। छपें किसी दिल में तस्वीर बन के अख़बार में नाम का बोझ क्यूँ हो। सूरज बिना शोर यूँ ही नहीं ढलता
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