सफ़र में मुकाम का बोझ क्यूँ हो
यूँ घर पे दुकान का बोझ क्यूँ हो।
बेफिक्र होकर लिखें दिल की बातें
ये ग़ज़ल है ,काम का बोझ क्यूँ हो।
छपें किसी दिल में तस्वीर बन के
अख़बार में नाम का बोझ क्यूँ हो।
सूरज बिना शोर यूँ ही नहीं ढलता
इक रात पे शाम का बोझ क्यूँ हो।
मंदिर बने बिना सीमेंट में लहू मिले
अमन पे श्री राम का बोझ क्यूँ हो।
हँसने रोने में अभिनय ठीक नहीं
जज़्बातों पे दाम का बोझ क्यूँ हो।
हाला तो उतनी ही जितनी पी जाए
पीनेवाले पे जाम का बोझ क्यूँ हो।