सच बोल कर कई बेकार हो गए झूट बेचकर कई सरकार हो गए। वो अपनी ही जमीन पे मजदूर थे हुक्मरां अब उसके जमींदार हो गए। गैरत को थोड़ा कम क्या किया मैंने इस जमाने में सब खरीदार हो गए। अपना हाल छोड़ कर सबका पता है चेहरे सारे यहाँ अखबार हो गए। कोई कलम से सच खँगालता रहा कई कलम बेचकर सरदार हो गए। वक्त और जज्बात की कीमत लगी रिश्ते अब यहाँ कारोबार हो गए। नींद भी बेच दी ख्वाहिशों को हमने इस कदर हम समझदार हो गए। लगाया चेहरे पे चेहरा हर मौके पे कभी इंसान थे,अब किरदार हो गए। वक्त बदला तुम्हारा ,शायद तुम भी तुम कभी तुम थे,अब जनाब हो गए। ये क्या घुल गया शहर की हवा में लोग चलते फिरते तलवार हो गए।