पौधा ये आंगन का पेड़ हो गया
चलो , मुकम्मल ये शेर हो गया।
सीने पे गोलियों से खेलने वाला
इक नज़र से देखो ढेर हो गया।
हर इक चेहरे पे देख लेता है
प्यार न हुआ ,इक खेल हो गया।
इक खबर बनने की चाहत में
पटरी से उतरा वो रेल हो गया।
नफ़रत पाली दिल में क्यूँ ऐसी
कड़ाही में उबलता तेल हो गया।