मुहब्बत में वो मुकाम ढूंढ रहा है घर में ही वो इक दुकान ढूंढ रहा है। दिखाना चाहता है कि बीमार है वो अपनी नाक में जुकाम ढूंढ रहा है। इमारतों की खोखली हँसी से ऊब बस्तियों में इक मुस्कान ढूंढ रहा है। नादाँ न समझा ताकत इस मिट्टी की नफरतों में वो हिन्दुस्तान ढूंढ रहा है। हरे रंग से प्यार है उस नमाजी को न समझो वो पाकिस्तान ढूंढ रहा है।