मुहब्बत को खुदा का इक असर कहता हूँ
दिमाग से दिलों का आसां सफर कहता हूँ।
झुग्गियों तक पहुँचे जहाँ महलों की रोशनी
उस पाक नगर को ही मैं शहर कहता हूँ।
क्या शाखें , क्या फूल , क्या पत्ते, टहनियाँ
जो बुलंदी से खड़ा, उसे मैं शजर कहता हूँ।
कमजोर हों दीवारें और शायद बेरंग भी
मजबूत छत,हँसते आँगन को मैं घर कहता हूँ।
कहने को आँखें तो सब कुछ देखती हैं
जो कतरे में समंदर देखे,उसे नज़र कहता हूँ ।
कत्ल हो इंसानों का मजहब के नाम पर
धर्म है तुम कहते हो ,मैं तो जहर कहता हूँ।