मुहब्बत ऐसे जिंदा रखते हैं
थोड़ी सी हम कम करते हैं।
बंद लिफाफे में ही रखकर
इक खत की खुशबू पढ़ते हैं।
वालिद की खुशी की ख़ातिर
अब भी हम उनसे डरते हैं।
बचपन जिंदा रखने ख़ातिर
कभी कभी तुमसे लड़ते हैं।
जिंदा बचे हैं हम कुछ ऐसे
जियादा जीते कम मरते हैं।
छोटा सा सच कहना होता है
इक ऊँचा पर्वत हम चढ़ते हैं।
तुम्हारी जुबाँ पे है इक ताला
चलो , इश्क है, हम कहते हैं।
खुद को थोड़ा सा पिघलाकर
खुद की नमी में हम पलते हैं।
खुद को थोड़ा सा दफनाकर
थोड़ा थोड़ा हम बढ़ते हैं।
न रह जाओ सफ़र में पीछे
ज़रा धीरे धीरे हम चलते हैं।