मेरा लिखा कोई ग़ज़ल थोड़े ही है
जंगली फूल है ,फसल थोड़े ही है।
यहाँ जानवर,जानवर ही दिखते हैं
ये तो जंगल है, शहर थोड़े ही है।
यूँ ही नहीं बेबस लाचार लगता है
जिधर दिखता है उधर थोड़े ही है।
इसमें दो और दो चार नहीं होते
इश्क इतना भी सरल थोड़े ही है।
आँखों से टपका और तुम डर गए
इक कतरा है, लहर थोड़े ही है।