मैं ज़िद में बैठा हूँ चाँद पाने के लिए उसे नसीब नहीं रोटी खाने के लिए। यूँ इतराओ ना जो मुस्कुरा दिया मैंने मैं तो रूठा ही था मान जाने के लिए। कुछ देर में मिलेगा वो इसी मोड़ पे जो गया है छोड़ वापिस आने के लिए। ठहाके भूल आए गली के नुक्कड़ पे चलें वहाँ फिर हँसने गाने के लिए। वो हवा नहीं, दरीचे पे आहट जिसकी किसी की साँसें हैं मुझे जगाने के लिए। छोड़ आया था भोला दिल मैं बगीचे में गाँव आया हूँ उसे वापिस लाने के लिए।