मैं ज़रा सा खुद से डरने लगा हूँ खुद का लिखा जो पढ़ने लगा हूँ। थोड़ा कम हुआ राब्ता रफ्तार से सूरज के साथ ढलने लगा हूँ। खुराक खुशियों की मिलने लगी है क्या दिल में तुम्हारे पलने लगा हूँ। भीतर से दस्तक ये कैसी आयी लहरों पे भी अब चलने लगा हूँ। लौट आया शायद बचपन मेरा बेवजह फिर से हँसने लगा हूँ। हौसला दिया उन झुकी नज़रों ने जो कहना था वो कहने लगा हूँ। ज़रा सा खुद से मुलाकात की है ज़रा सा तुम्हें अब खलने लगा हूँ। रिश्तों से अब तक जुड़ता रहा था मजहबों में अब बँटने लगा हूँ।