मैं सुबह बेचता हूँ ,मैं शाम बेचता हूँ
नहीं मैं महज़ अपना काम बेचता हूँ।
इन बूढ़े दरख्तों को बेजान न समझो
मैं अभी तक पिता का नाम बेचता हूँ।
हुयी सस्ती ये दुनिया ,महँगा रहा मैं
अब दे इश्तिहार नया दाम बेचता हूँ।
सियासत का शौक जो पाला है मैंने
कभी रहीम तो कभी राम बेचता हूँ।
मुफलिसी भी क्या क्या रंग दिखाती है
मुँह से लगा हुआ मैं जाम बेचता हूँ।