मैं सफर में जरा रुकते हुए चलता हूँ बिखरे हसीं लम्हें चुनते हुए चलता हूँ। यूँ ही नहीं इन जंगलों में भटकता हूँ मैं मैं कोयल की कूक सुनते हुए चलता हूँ। कुछ हकीकतों को नदियों में बहाकर कुछ ख्वाब रुमानी बुनते हुए चलता हूँ। कितना हसीं लगता है ऊँघता आसमां मैं सूरज के साथ डूबते हुए चलता हूँ। कुछ परिन्दों से दोस्ती हो गयी आजकल जमीं पर भी अब उड़ते हुए चलता हूँ। इक चाभी मिल गयी है दिल के ताले की लहक कर अब खुलते हुए चलता हूँ।