कोशिश तो बहुत थी कि रात हदों में रहे हम करवटों में रहे,तुम सिलवटों में रहे। हमें नहीं मंजूर ताजमहल उनके लिए ये क्या कि हो कैद इश्क मकबरों में रहे। ऐ वाइज़ आ हाथ लगा झाड़ू पोंछे को भी क्यूँ सारा ध्यान महज़ फलसफों में रहे। क्या ख़ाक निपटाएंगे बस्तियों के मसले वो जो ताउम्र हवेली और महलों में रहे। जिंदगी मौत से बदतर कैसे,उनसे पूछो जो अपनी मुहब्बत की नफरतों में रहे।