खुद से ही लड़ कर उठना है मुझे
थोड़ा गिरना है जो उड़ना है मुझे।
मेरे भीतर कुछ जकड़ सा गया है
अब तो थोड़ा सा पिघलना है मुझे।
गिरफ्तार सा हूँ मैं इस मकान में
माँ के आँचल में फिर रहना है मुझे।
मैंने ही तो पाला है ये रोग अना का
अब तो दर्द इसका सहना है मुझे।
मैं बिल्कुल ही तुम्हारे काबिल नहीं
तुम्हारी आँखों से अब बहना है मुझे।
बेखौफ हूँ मैं ,ये बस दिखाता हूँ
बच्चे की तरह अब डरना है मुझे।
ये तौर तरीके , ये शहरी तहज़ीब
खिलखिलाकर फिर हँसना है मुझे।
हकीकतों ने मुझे मार सा दिया है
खुद को फिर से अब ठगना है मुझे।
तुम थे , तुम हो , बस तुम ही हो
फिर से तुम्हें अब ये कहना है मुझे।
इस शहर में जी कर तो देख लिया
इक जंगल में सुकूं से मरना है मुझे।